राग और द्वेष से मुक्त होकर ही सुखी जीवन संभव है
राग और द्वेष ये दोनों हमारे
जीवन के लिए हानिकारक हैं।
कभी –कभी हमें किसी
के प्रति इतना लगाव हो जाता है की हम चाहकर भी उससे दूर नहीं हो पाते। हमारी आशक्ति उसके प्रति गहरी हो जाती है और कभी
हमें किसी के प्रति इतनी नफरत हो जाती है की हम उसे देखना भी नहीं चाहते
ये दोनों इस तरह है की बिना एक के दूसरा हो नहीं
सकता । और दोनों एक साथ रह भी नहीं सकते क्योंकि जब राग
होगा तब द्वेष नहीं होगा । और जब द्वेष होगा
तब राग नहीं होगा।जिस प्रकार एक म्यान में तो तलवार नहीं रह सकती
ठीक उसी प्रकार राग और द्वेष एक साथ नहीं रह सकते
द्वेष क्या है? द्वेष का अर्थ, राग और द्वेष में अंतर और इससे मुक्त होने का तरीका
मनुष्य के जीवन में सुख और दुख केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं आते, बल्कि हमारे मन की भावनाएँ और उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं।
किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक लगाव हमें बांध सकता है और किसी व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति लगातार विरोध या नापसंदगी भी मन की शांति छीन सकती है।
भारतीय दर्शन में राग और द्वेष को मन की महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों के रूप में समझाया गया है।
लेकिन आखिर द्वेष क्या है? द्वेष का अर्थ क्या होता है? राग और द्वेष में क्या अंतर है? और क्या इन दोनों से मुक्त होकर मनुष्य वास्तव में अधिक शांत और सुखी जीवन जी सकता है?
आइए इसे सरल भाषा में समझते हैं।
द्वेष क्या है?
द्वेष का अर्थ किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति या विचार के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली तीव्र नापसंदगी, विरोध या वैर-भावना से है।
जब किसी घटना या व्यक्ति के प्रति हमारे मन में लगातार नकारात्मक भावना बनी रहती है और हम उससे दूर रहना चाहते हैं या उसके प्रति विरोध महसूस करते हैं, तो इसे सामान्य रूप से द्वेष की भावना कहा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया और उस घटना के बाद हम लंबे समय तक उसके प्रति क्रोध, विरोध या नफरत की भावना रखते रहे, तो यह द्वेष का रूप ले सकता है।
हालांकि किसी गलत व्यक्ति या परिस्थिति से दूरी बनाना और उसके प्रति द्वेष रखना एक ही बात नहीं है।
सही और गलत में अंतर समझना विवेक है, जबकि किसी घटना की नकारात्मक भावना को लंबे समय तक अपने मन में पकड़े रखना द्वेष का कारण बन सकता है।
द्वेष का अर्थ क्या है?
सरल शब्दों में:
द्वेष का अर्थ है—किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति मन में उत्पन्न होने वाला विरोध, वैर या गहरी नापसंदगी।
द्वेष में केवल किसी चीज को पसंद न करना ही शामिल नहीं है। जब नापसंदगी इतनी बढ़ जाए कि मन बार-बार उसी व्यक्ति या घटना के बारे में नकारात्मक विचार करने लगे, तब यह भावना हमारे मानसिक जीवन को प्रभावित करने लगती है।
इसलिए द्वेष केवल सामने वाले व्यक्ति के लिए समस्या नहीं है। कई बार इसका सबसे अधिक बोझ उसी व्यक्ति को उठाना पड़ता है जिसके मन में यह भावना बनी रहती है।
राग -rag
राग का अर्थ है आशक्ति ,लगाव जब किसी व्यक्ति को किसी बस्तु या व्यक्ति
के प्रति लगाव हो जाय। वह उसके लगाव में इस प्रकार अधीर हो जाय की चाहकर भी वह उससे
दूर न हो पाए तो उसको राग कहते है । राग सजीव के साथ तो
होता है लेकिन निर्जीव के प्रति भी राग उत्पन्न होता है।। जैसे कोठी ,बंगला ,कार ,आदि के प्रति भी गहरा
लगाव हो जाता है हमें यह लगने लगता है की बिना इनके जीवन संभव नहीं ।इन्ही नश्वर चीजो के साथ आशक्ति हो जाती है इनके
मिलने से सुख और न मिलने से दुःख होता है ।
राग और द्वेष में क्या अंतर है?
राग और द्वेष एक जैसे नहीं हैं।
राग किसी चीज के प्रति अत्यधिक आकर्षण या आसक्ति है, जबकि द्वेष किसी चीज के प्रति अत्यधिक विरोध या नापसंदगी की भावना है।
इसे उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को एक विशेष व्यक्ति की प्रशंसा और साथ बहुत पसंद है। वह उसके प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है। यह राग की स्थिति हो सकती है।
लेकिन यदि बाद में किसी घटना के कारण वही व्यक्ति उसके प्रति तीव्र विरोध या नफरत महसूस करने लगे, तो यह द्वेष की भावना हो सकती है।
इस प्रकार कभी-कभी राग से द्वेष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि हर द्वेष के पीछे पहले राग होना ही चाहिए
मन में द्वेष क्यों उत्पन्न होता है?
द्वेष अचानक भी उत्पन्न हो सकता है और धीरे-धीरे भी विकसित हो सकता है।
1. अपमान या बुरा व्यवहार
जब कोई व्यक्ति हमारे साथ ऐसा व्यवहार करता है जिसे हम अन्यायपूर्ण या अपमानजनक मानते हैं, तो हमारे मन में उसके प्रति विरोध पैदा हो सकता है।
2. अत्यधिक अपेक्षाएँ
कई बार हम किसी व्यक्ति से बहुत अधिक उम्मीद कर लेते हैं।
हमें लगता है कि वह हमारी इच्छा के अनुसार व्यवहार करेगा।
लेकिन जब वह हमारी उम्मीद के अनुसार काम नहीं करता तो निराशा पैदा होती है। यदि निराशा और क्रोध लगातार बने रहें तो संबंध में विरोध की भावना बढ़ सकती है।
3. पुरानी घटनाओं को बार-बार याद करना
घटना समाप्त हो जाती है, लेकिन मन उसे बार-बार दोहराता रहता है।
यही पुरानी स्मृति धीरे-धीरे नकारात्मक भावना को मजबूत कर सकती है।
4. अहंकार
कभी-कभी हमारा अहंकार किसी दूसरे व्यक्ति की बात स्वीकार नहीं कर पाता।
हम सोचते हैं—
“उसने मेरी बात कैसे नहीं मानी?”
यहीं से मन में विरोध पैदा होना शुरू हो सकता है।
5. तुलना और ईर्ष्या
जब हम लगातार अपनी तुलना दूसरे लोगों से करते हैं तो उनके पास मौजूद सफलता, धन, सम्मान या सुविधाओं को देखकर ईर्ष्या पैदा हो सकती है।
यदि यह भावना बढ़ती जाए तो दूसरे व्यक्ति के प्रति विरोध भी पैदा हो सकता है।
राग और द्वेष मनुष्य को कैसे बांधते हैं?
राग और द्वेष देखने में एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत लगते हैं।
राग कहता है—
“मुझे यह चाहिए।”
द्वेष कहता है—
“मुझे यह बिल्कुल नहीं चाहिए।”
लेकिन दोनों परिस्थितियों में मन उसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में सोचता रहता है।
यही बात समझने योग्य है।
जिस व्यक्ति से हमें बहुत अधिक प्रेम है, हम उसके बारे में बार-बार सोच सकते हैं।
और जिस व्यक्ति से हमें बहुत अधिक द्वेष है, उसके बारे में भी हम बार-बार सोच सकते हैं।
इस प्रकार दोनों ही परिस्थितियों में मन बाहरी वस्तु या व्यक्ति से प्रभावित हो सकता है।
राग की आसक्ति में मनुष्य क्या भूल जाता है?
जब मनुष्य किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है तो वह कई बार उसके वास्तविक स्वरूप को देखने के बजाय अपनी इच्छा के अनुसार उसे देखने लगता है।
उसे लगता है—
“यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख है।”
लेकिन संसार की सभी परिस्थितियाँ परिवर्तनशील हैं।
आज जो हमारे पास है, वह हमेशा हमारे पास रहे, यह आवश्यक नहीं।
घर, धन, पद, प्रतिष्ठा, संबंध और शरीर—इन सभी में समय के साथ परिवर्तन होता है।
इसलिए वस्तुओं का उपयोग करना अलग बात है और उनके प्रति इतनी आसक्ति पैदा कर लेना कि उनके बिना जीवन असंभव लगने लगे, अलग बात है।
द्वेष में मनुष्य क्या भूल जाता है?
द्वेष की स्थिति में मनुष्य सामने वाले व्यक्ति की केवल गलतियों को देखने लगता है।
वह यह भूल सकता है कि:
हर मनुष्य अपनी समझ, परिस्थिति, संस्कार और स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि गलत व्यवहार को सही मान लिया जाए।
यदि कोई व्यक्ति गलत कर रहा है तो उससे दूरी बनाना, अपनी सीमा तय करना और आवश्यक कदम उठाना बिल्कुल उचित हो सकता है।
लेकिन अपने मन को लगातार क्रोध और नफरत में जलाते रहना अलग बात है।
दूसरे के गलत व्यवहार का विरोध किया जा सकता है, लेकिन उसके कारण अपनी पूरी मानसिक शांति खो देना आवश्यक नहीं है।
बिच्छू और साधु की कहानी से क्या सीख मिलती है?
हमारे आध्यात्मिक साहित्य और लोककथाओं में एक प्रसिद्ध उदाहरण मिलता है कि बिच्छू का स्वभाव डंक मारना है।
इस उदाहरण से एक महत्वपूर्ण बात समझाई जाती है—
दूसरे के स्वभाव को बदलने की कोशिश करने के बजाय हमें अपने विवेक को मजबूत करना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति बार-बार हमारे साथ गलत व्यवहार करता है तो हमें यह समझना चाहिए कि उसके व्यवहार को बदलना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।
लेकिन हम उसके प्रति कैसे प्रतिक्रिया दें, अपनी सीमाएँ कैसे निर्धारित करें और अपनी मानसिक शांति कैसे बनाए रखें—इस पर हम काम कर सकते हैं।
महर्षि पतंजलि और राग-द्वेष
योग दर्शन में राग और द्वेष को मन की महत्वपूर्ण क्लेशात्मक प्रवृत्तियों में समझाया गया है।
पतंजलि योगसूत्र में:
“सुखानुशयी रागः”
और
“दुःखानुशयी द्वेषः”
के माध्यम से राग और द्वेष की प्रकृति की ओर संकेत किया गया है।
सरल शब्दों में समझें तो सुखद अनुभव से जुड़ाव राग की ओर और दुखद अनुभव से जुड़ी विरोधात्मक प्रवृत्ति द्वेष की ओर ले जा सकती है।
योग दर्शन का उद्देश्य केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलना नहीं है, बल्कि मन की इन प्रवृत्तियों को पहचानकर उनसे ऊपर उठने का मार्ग दिखाना भी है
क्या ईश्वर के प्रति राग होना चाहिए?
यहाँ आपके पुराने लेख का सबसे सुंदर आध्यात्मिक विचार रखा जा सकता है, लेकिन उसे थोड़ा स्पष्ट करके।
संसार की नश्वर वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य को बांध सकती है। इसके विपरीत आध्यात्मिक परंपरा में ईश्वर के प्रति भक्ति, प्रेम और समर्पण को मन को ऊंचा उठाने वाला भाव माना गया है।
यदि मनुष्य का प्रेम केवल धन, वस्तु, पद और प्रतिष्ठा तक सीमित न रहकर ईश्वर, सत्य, करुणा और धर्म जैसे उच्च मूल्यों की ओर बढ़ता है, तो उसका जीवन अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है।
इसी भाव को संतों की भक्ति परंपरा में बार-बार समझाया गया है।
सुखी जीवन के लिए सबसे बड़ी सीख
जीवन में प्रेम कीजिए, लेकिन ऐसी आसक्ति न पैदा करें कि सामने वाली वस्तु या व्यक्ति के बिना आपका जीवन ही अर्थहीन लगने लगे।
गलत का विरोध कीजिए, लेकिन ऐसा द्वेष न पालें कि आपका मन हमेशा उसी व्यक्ति के बारे में सोचता रहे।
अपनी सीमाएँ तय कीजिए, लेकिन अपने मन की शांति किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार के हाथों में मत सौंपिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
अपने मन को देखना सीखिए।
क्योंकि कई बार समस्या बाहर की परिस्थिति से अधिक हमारे भीतर उस परिस्थिति के प्रति बनी हुई प्रतिक्रिया में होती है।
जब मन राग और द्वेष के प्रभाव से धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है, तब व्यक्ति परिस्थितियों को अधिक स्पष्टता से देख पाता है।
और शायद यही सुखी जीवन की ओर बढ़ने का एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
राग और द्वेष से निकलने का एकमात्र उपाय -rag aur dwesh se nikalne ka ekmatr upay
ध्यान
और विवेक।
महर्षि पतंजलि ने राग और द्वेष से दूर होने को वीतराग पुरुष का ध्यान करने के लिए कहा। वितराग वह जिसके सभी राग समस्त और वृत्तियाँ शांत हो चुकी हो ।और वह सभी इन चीजों से पार जा चुका है। जैसे वशिष्ठ जी, विश्वामित्र, नारद, भगवान कृष्ण ,प्रभु श्रीराम के प्रति राग होना
चाहिए ।
फिर ईश्वर के प्रति राग उत्पन्न हो जाए
तो हमारा जीवन धन्य हो जाए। जो नष्ट होने वाली चीजें हैं। उनके प्रति राग उत्पन्न होना और जो समस्त सृष्टि का संचालक
है जो कण कण में है। जो सदैव रहने वाला है , यदि उसके प्रति राग हो जाए, गहरा लगाव हो जाए
तो जीवन धन्य बन जाए।
राग और द्वेष से संबंधित सामान्य प्रश्न
1. द्वेष किसे कहते हैं?
किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति या विचार के प्रति मन में उत्पन्न तीव्र विरोध, वैर या नापसंदगी की भावना को सामान्य रूप से द्वेष कहा जाता है।
2. द्वेष का अर्थ क्या है?
द्वेष का सरल अर्थ है—मन में किसी के प्रति विरोध, वैर या गहरी नापसंदगी का भाव।
3. राग किसे कहते हैं?
किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक लगाव या आसक्ति को राग कहा जाता है।
4. राग और द्वेष में क्या अंतर है?
राग किसी चीज के प्रति अत्यधिक लगाव है, जबकि द्वेष किसी चीज के प्रति अत्यधिक विरोध या नापसंदगी है।
5. क्या राग से द्वेष उत्पन्न हो सकता है?
कई परिस्थितियों में अत्यधिक लगाव, अपेक्षा या संबंध में आई चोट के कारण विरोध और द्वेष की भावना उत्पन्न हो सकती है, लेकिन हर द्वेष के पीछे पहले राग होना आवश्यक नहीं है।
6. द्वेष से कैसे मुक्त हों?
अपने भाव को पहचानना, अनावश्यक नकारात्मक विचारों को बार-बार दोहराने से बचना, उचित सीमाएँ बनाना, क्षमा की भावना विकसित करना तथा ध्यान और आत्मचिंतन का अभ्यास करना उपयोगी हो सकता है
अंतिम निष्कर्ष
राग और द्वेष मन की ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जो हमारे विचारों और व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
राग हमें किसी चीज से अत्यधिक बांध सकता है और द्वेष किसी व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति लगातार नकारात्मक बनाए रख सकता है।
इसलिए जीवन का उद्देश्य यह नहीं कि हम किसी से प्रेम ही न करें या किसी गलत बात का विरोध ही न करें।
बल्कि उद्देश्य यह है कि हमारे प्रेम में विवेक हो और हमारे विरोध में भी विवेक हो।
जब मनुष्य यह सीख जाता है कि कौन-सी भावना उसके जीवन को ऊंचा उठा रही है और कौन-सी भावना उसे भीतर से बांध रही है, तब वह धीरे-धीरे अधिक शांत और संतुलित जीवन की ओर बढ़ सकता है।
सच्ची स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों से मुक्त होने में नहीं, बल्कि अपने ही मन की अनावश्यक आसक्ति और द्वेष से मुक्त होने में भी है
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